यह कि पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा एक सामान्य लेकिन अक्सर विवादास्पद मसला है। भाई-बहनों के बीच, माँ-बाप और बच्चों के बीच, या सह-स्वामियों (co-owners) के बीच संपत्ति विभाजन की ज़रूरत पड़ती है। इसके लिए कानूनी रास्ता हमेशा उपलब्ध है।
आपसी सहमति से बंटवारा — सबसे आसान रास्ता
यह कि अगर सभी हिस्सेदार सहमत हों तो पारिवारिक समझौता विलेख (Family Settlement Deed) बनाई जाती है। इसे नोटरी से या रजिस्ट्री ऑफिस में पंजीकृत (registered) करवाया जा सकता है। पंजीकृत बंटवारा सबसे मज़बूत और लागू करने योग्य होता है।
विभाजन वाद (Partition Suit)
यह कि अगर आपसी सहमति न हो, तो सिविल कोर्ट में विभाजन वाद (Partition Suit) दायर किया जा सकता है। CPC (सिविल प्रक्रिया संहिता) के तहत यह वाद दायर होता है। अदालत सभी हिस्सेदारों को नोटिस भेजती है, सुनवाई करती है और प्रत्येक के हिस्से का निर्धारण करती है।
हिंदू उत्तराधिकार में बंटवारे के अधिकार
यह कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (2005 संशोधन के साथ) के तहत:
- बेटियों को बेटों के बराबर हिस्सा मिलता है पैतृक संपत्ति में
- विधवा पत्नी का भी समान हिस्सा होता है
- पोते-पोतियों का भी अधिकार हो सकता है अगर उनके माता-पिता मर चुके हों
यह कि बंटवारे के लिए आमतौर पर ये दस्तावेज़ चाहिए: संपत्ति के मूल कागज़ात (sale deed, jamabandi), परिवार के सभी सदस्यों की पहचान और रिश्ते का प्रमाण, मृत सदस्य की स्थिति में मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार प्रमाण पत्र।
महत्वपूर्ण बातें
विभाजन वाद में सीमा (Limitation) का ध्यान रखें — सह-स्वामी (co-owner) की जानकारी होने के 12 साल के भीतर वाद दायर होना चाहिए।
राजस्थान में भूमि का बंटवारा राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में भी दर्ज करवाना ज़रूरी है — SDO या तहसीलदार के पास।
मध्यस्थता (Mediation) से बंटवारा करने पर समय और खर्च दोनों बचते हैं।
अगर कोई हिस्सेदार अपना हिस्सा बेचना चाहे तो अन्य हिस्सेदारों को पहले खरीदने का अधिकार (Pre-emption) मिल सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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