यह कि तलाक या अलगाव के बाद सबसे दर्दनाक मुद्दा होता है — बच्चे की कस्टडी। माँ और पिता दोनों अपने बच्चे को चाहते हैं, लेकिन कानून को बच्चे के हित (Best Interest of the Child) को सर्वोपरि रखना होता है।
कस्टडी के प्रकार
यह कि भारतीय कानून में मुख्यतः दो प्रकार की कस्टडी होती है:
- Physical Custody (शारीरिक अभिरक्षा): बच्चा किसके साथ रहेगा
- Legal Custody (कानूनी अभिरक्षा): बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य, धर्म आदि के निर्णय कौन लेगा
5 साल से छोटे बच्चों के लिए नियम
यह कि हिंदू अल्पसंख्यकता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के अनुसार, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी आमतौर पर माँ को दी जाती है — जब तक कि माँ की उपयुक्तता पर कोई गंभीर सवाल न हो।
फैमिली कोर्ट क्या देखती है?
यह कि फैमिली कोर्ट कस्टडी का फैसला करते समय इन बातों पर ध्यान देती है:
- बच्चे की उम्र और लिंग
- माँ-पिता में से कौन बच्चे की देखभाल बेहतर कर सकता है
- बच्चे की इच्छा (अगर बच्चा समझदार है)
- माँ-पिता की आर्थिक स्थिति
- बच्चे का स्कूल और सामाजिक वातावरण
- क्या माता या पिता पर किसी प्रकार के दुर्व्यवहार के आरोप हैं
यह कि जिस माता-पिता को कस्टडी नहीं मिलती, उन्हें बच्चे से मिलने का अधिकार (Visitation Rights) दिया जाता है। यह आमतौर पर सप्ताहांत, छुट्टियों में या निर्धारित समय पर होता है। कोर्ट के आदेश के बिना दूसरे पक्ष को विज़िटेशन से नहीं रोका जा सकता।
महत्वपूर्ण बातें
कस्टडी का मामला फैमिली कोर्ट, जयपुर में दायर होता है — अगर दोनों पक्ष जयपुर में रहते हैं।
कस्टडी का अंतरिम आदेश (Interim Custody Order) तुरंत मांगा जा सकता है — पूरे मुकदमे का इंतज़ार नहीं करना पड़ता।
अगर दूसरा पक्ष बच्चे को लेकर भाग जाए या मिलने न दे — हेबियस कॉर्पस याचिका (Habeas Corpus) दायर की जा सकती है।
संयुक्त कस्टडी (Joint Custody) भी संभव है — दोनों माता-पिता बारी-बारी बच्चे के साथ समय बिताते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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