बहुत से लोगों को यह अनुभव होता है — थाने जाकर शिकायत दी, लेकिन पुलिस ने यह कहकर टाल दिया कि "यह हमारे क्षेत्र का मामला नहीं है" या "पहले जांच करेंगे, फिर तय करेंगे" या सीधे मना कर दिया। यह गैरकानूनी है। कानून पुलिस को इसकी छूट नहीं देता।
कानून क्या कहता है — एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है
भारतीय न्याय संहिता की प्रक्रिया के तहत (पहले सीआरपीसी की धारा 154, अब BNSS की धारा 173), यदि किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) — यानी ऐसा अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है, जैसे मारपीट, चोरी, धोखाधड़ी, दहेज उत्पीड़न आदि — की सूचना पुलिस को दी जाती है, तो थाना प्रभारी के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में यह स्पष्ट कर दिया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर प्राथमिक जांच (preliminary inquiry) की कोई आवश्यकता नहीं — एफआईआर तुरंत दर्ज होनी चाहिए।
केवल कुछ खास तरह के मामलों में — जैसे वैवाहिक/पारिवारिक विवाद, व्यावसायिक अपराध, भ्रष्टाचार के मामले, या जहां शिकायत में असामान्य देरी हो — पुलिस 7 दिनों के भीतर प्राथमिक जांच कर सकती है, लेकिन इसके बाद भी अगर संज्ञेय अपराध बनता दिखे तो एफआईआर दर्ज करनी ही होगी।
अगर थाने में एफआईआर दर्ज नहीं हो रही तो क्या करें
- लिखित शिकायत दें और रसीद मांगें — शिकायत की एक कॉपी पर थाने की मुहर और प्राप्ति तिथि ज़रूर लगवाएं।
- पुलिस अधीक्षक (SP) को शिकायत भेजें — डाक, ऑनलाइन पोर्टल, या सीधे कार्यालय में। धारा 154(3) के तहत वरिष्ठ अधिकारी को शिकायत भेजने का अधिकार है, जो खुद जांच कर सकते हैं या जांच का आदेश दे सकते हैं।
- मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन करें — BNSS की धारा 175(3) (पूर्व में सीआरपीसी 156(3)) के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के पास आवेदन देकर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिलवाया जा सकता है।
- राज्य पुलिस की ऑनलाइन शिकायत सुविधा का उपयोग करें — कई राज्यों में ऑनलाइन एफआईआर/शिकायत पोर्टल उपलब्ध हैं जहां सीधे शिकायत दर्ज की जा सकती है।
मजिस्ट्रेट भी आवेदन ठुकरा दे तो?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3)/175(3) के आवेदन को अस्वीकार किए जाने के बावजूद, पुलिस का धारा 154 के तहत स्वतंत्र कानूनी कर्तव्य समाप्त नहीं होता। यानी पुलिस अब भी सीधे एफआईआर दर्ज कर सकती है और करनी चाहिए — दोनों रास्ते एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं।
याद रखने योग्य मुख्य बातें
संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज करना पुलिस का कर्तव्य है, विवेकाधिकार नहीं।
हर स्तर पर लिखित प्रमाण रखें — शिकायत की प्रति, रसीद, डाक की पावती।
SP को शिकायत और मजिस्ट्रेट के पास आवेदन — दोनों साथ-साथ किए जा सकते हैं, एक-दूसरे के विकल्प के रूप में नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
इस विषय से जुड़े वो सवाल जो लोग सबसे ज़्यादा पूछते हैं